कैलेंडर वाला बच्चा (कहानी)
सुनील पांडेय ‘सुकुमार ‘
श्याम को बचपन से ही छोटे बच्चों से बेहद लगाव था। बच्चों को वो बेइंतहा पसंद करता था। बचपन में वह अखबार, मैगजीन आदि से बच्चों की तस्वीर काट कर रखता था और उन्हें अपने कमरे की दीवारों पर चिपकाए रखता। हर रविवार अथवा छुट्टी के दिन वह उन तस्वीरों पर लगी धूल- मिट्टी की साफ -सफाई भी करता था। उसका यह शौक बड़े होने पर जारी रहा ।अब वह छोटे बच्चों की तस्वीरों को एल्बम में लगाने लगा ,तथा बच्चों से संबंधित कैलेंडर अपने कमरे की दीवारों पर टांगने लगा। उसका कमरा छोटे बच्चों के कैलेंडर से भरा हुआ था।

जब कोई उसका संगी- साथी उसके कमरे में आाता तो वह उन कैलेंडर वाले बच्चों से उनका एक- एक कर परिचय भी करवाता था। इतना ही नहीं कैलेंडर वाले सभी बच्चों का उसने अलग-अलग नाम भी दे रखा था। कोई सोनू, कोई मोनू ,कोई गुड़िया तो कोई डाली और न जाने कितने नाम इन बच्चों को उसने दे रखें थे । सभी बच्चों से वह बारी-बारी अकेले में बातें भी करता था। शायद ये बच्चे हकीकत में न सही सपनों में जरूर श्याम से अपनी तोतली जुबान में बातें किया करते रहें होंगे।
श्याम ने गांव से शिक्षा पूरी करके शहर के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएट भी कर लिया था ,लेकिन अभी तक उसे कोई ढंग का रोजगार नहीं मिला था। श्याम के मां- बापू ने श्याम की शादी भी एक मध्यम वर्गीय परिवार में कर दी थी। श्याम की शादी जिस लड़की के साथ हुई थी वह अपने भाई बहनों में सबसे छोटी एवं बडी़ लाडली थी। इसलिए वह स्वभाव से थोड़ा तुनकमिजाज और मनमौजी स्वभाव की थी । यह उसका संस्कार कहें या उसका बचपना जो भी हो वह शाम का बड़ा खयाल रखती थी। यह एक अजीब संयोग था कि श्याम की तरह उसकी जीवनसंगिनी को भी बच्चों से बेहद लगाव था। बच्चों से संबंधित श्याम के कलेक्शन को वह देखकर वह बहुत खुश होती थी। उनमें से जिस बच्चे की सबसे शरारती मुद्रा में तस्वीर होती वह कहती श्यामू तू बचपन में जरूर ऐसे ही शरारती रहा होगा। श्याम कहता था मैं ऐसा नहीं था मैं तो सीधा -साधा था तेरी तरह बदमाश थोड़ी था। बदमाश तो वह हंसी -ठिठोली में कहता था लेकिन वह चिढ़ जाती थी और कहती जाओ मैं तुझसे बात नहीं करूंगी। श्याम कहता कब तक? वह कहती जब तक मेरी मर्जी। तुम जब देखो तब मुझे चिढ़ाते ही रहते हो मैं अपने घर चली जाऊंगी। श्याम कहता जा -जा अभी शाम वाली बस मिल जाएगी ।तू वहां भी नहीं रह पाएगी दो-चार दिन में अपने भैया- भाभी से लड़ -झगड़ कर मेरे पास भाग आएगी। वह कहती पहले की बात छोड़ दे इस बार मैंं नहीं आने वाली, तू ही मुझसे मिलने आएगा देख लेना। श्याम कहता जा -जा किसने तुझे रोका है । मैं इन अपने कैलेंडर वाले बच्चों से बेहद खुश हूं ।जब तू नहीं थी तब भी ये मेरे पास थे और आज भी मेरे पास हैं। तेरे मायके जाने के बाद रात में ये तेरी शिकायत एक-एक करके सभी मुझसे किया करते हैं। वह श्याम के इस मस्खरी से और चिढ़ जाती और तुनककर कहती तेरी तरह ही ये तेरे बच्चे मुझसे चिढ़ते हैं। मैं अपने लिए असली का बच्चा भगवान जी से मांग लूंगी ।वह मुझसे दिन- रात बात करेगा और बड़ा होकर खूब नाम कमाएगा और बड़ा होने पर उसकी शादी भी सुंदर सी लड़की के साथ करूंगी। श्याम कहता वह सब तो ठीक है पर अपनी जैसी मत लाना वरना मेरी तरह बेचारा तेरा बेटा भी परेशान रहेगा। यह तो दोनों की हंसी- ठिठोली थी ,असलियत में दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे।
शादी के कुछ साल बाद श्याम के घर -आंगन में असली का बच्चा आने वाला था पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। वह बच्चा दुनिया में आने से पहले ही गर्भ में चल बसा। श्याम उसके बाद भी उन कैलेंडर वाले बच्चों से खेलता रहता था , लेकिन श्याम को यकीन था एक ना एक दिन जरूर इन कागज के बच्चों में कोई बच्चा हकीकत का बच्चा बनकर उसके पास आएगा। समय बीतता गया धीरे-धीरे वह दिन भी आया जब श्याम की जीवनसंगिनी दोबारा गर्भवती हुई । नौ माह बाद आखिर वह दिन भी आया जब श्याम और उसकी जीवनसंगिनी के घर आंगन में एक हकीकत का बच्चा भी आ गया । आज वह बच्चा सात साल का हो गया है। श्याम और उसकी जीवनसंगिनी उसके लालन- पालन एवं पढ़ाई- लिखाई में लगे हुए हैं । श्याम और उनकी जीवनसंगिनी को उम्मीद है कि भविष्य में जरूर उनका बच्चा बड़ा होकर एक बड़ा अधिकारी बनेगा। वह हम दोनों के साथ- साथ अपने परिवार का नाम भी रोशन करेगा ।