Jaya Mohan Prayagraj Uttar Pradesh
ममता का दान : जया मोहन प्रयागराज

बाहर जोरो की बारिश हो रही थी। तेज आवाज के साथ बिजली कड़क रही थी। लगता था मानो अभी अभी गिर जाएगी। नीलेश बेटी को सीने से चिपकाए विचारों में डूबा था। मन उहा पोह की स्थिति में था। क्या करें क्या मुन्नी को जाकर बुला लाए। फिर स्वयं सोचता की वह मेरे बारे में क्या सोचेगी पुरानी यादें स्मृतियों के द्वार खटखटा रही थी।याद आरही थी मुन्नी की माँ जेईसे वह मौसी कहता था।मौसी माँ के मायके से उनकी शादी के साथ आई थी। वह वह उम्र में मां से छोटी थी। नाना जी को वह सड़क के किनारे लावारिस मिली थी। वह अपने साथ उन्हें घर ले आए थे। मौसी नाना के घर पली-बढ़ी। मां के साथ उनके ससुराल आने पर उन्होंने अपने अपने हंसमुख स्वभाव से सभी का मनजीत लिया। मेरे होने पर उन्होंने मुझे संभालने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। मुझे नहलाना खिलाना सुलाना सारा काम मौसी तन्मयता से करती। मुझे याद है की मौसी जब लोरी सुनाती तो कानों में मीठा शहद सा घुल जाता। पापा ने पापा ने उनकी शादी एक यतीम लड़के से करवा दी तथा एक फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी। यह लोग घर के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते। उनकी बेटी मुन्नी मुझसे 8 वर्ष छोटी थी। वह सारा दिन मौसी के साथ घर में रहती। मां मुन्नी को बहुत प्यार करती। मां कहती मुन्नी यह तुम्हारा भाई है। इसे भैया कहा करो पर मुन्नी मुझे छोटे साहब कहती।सब हँसते।बहुत अच्छे दिन बीत रहे थे। अचानक एक दिन वज्रपात हुआ। मां पापा मुन्नी के पिता के साथ एक शादी में गए थे। कार मुन्नी के पिता चला रहे थे। लौटते समय एक ट्रक ने पीछे से टक्कर मार दी। तीनो लोग खत्म हो गए। मौसी मुन्नी और हम रो रहे थे साथ ही एक दूसरे को धीरज बंधा रहे थे। इधर कुछ दिनों से मौसी की तबीयत ढीली रहती। वह कहती भैया शादी कर लो। मैं भी पढ़ लिख कर राजपत्रित अधिकारी बन गया था। मैंने अपने साथ काम करने वाली युवती से विवाह कर लिया।
मौसी नेहा यानी मेरी पत्नी का पूरा ध्यान मां की तरह रखती। जब मौसी को मालूम पड़ा कि हमारी जीवन बगिया में फूल खिलने वाला है वो बेहद खुश हुई। मुन्नी तो सुनकर दीवानी हो गई। अब हमारे घर में प्यारा सा बच्चा आएगा। वह ऊ ऊ ऊ रोयेगा खिलखिलायेगा कितना अच्छा लगेगा।नेहा भी दोनों से खूब हिलिमिली थी।वह मौसी को सम्मान व मुन्नी को प्यार देती। वह बाजार जाती तो मुन्नी के लिए सामान लाती। कभी कभी झूठी नाराज़गी दिखा कर कहती मुन्नी मुझे भाभी कहो।मुन्नी हँस कर कहती आप तो मेरी मेम साहब हो।डिलीवरी का समय पास आ रहा था। हमने घर का एक कमरा बेबी रूम बना उसे खूब खिलौनों से सजा दिया। हम सब बैठते तो बातें करते हैं की बेटा होगा तो यह नाम रखेंगे बेटी होगी तो यह नाम रखेंगे। नेहा कहती बेटी होगी मैं उसका नाम रूही रखूंगी। वह मेरी जान मेरी रूह होगी।
प्रसव का समय आने पर हम नेहा को अस्पताल ले गए। नियत समय पर गोल मटोल घुंघराले बालों वाली बच्ची ने जन्म लिया। मौसी और मुन्नी वहीं पर नाचने लगी मैंने सबको मिठाई बांटी। शाम को मौसी मुन्नी घर चली गयी। दूसरे दिन नेहा को बुखार आ गया।दोपहर में तबियत ज्यादा बिगड़ गयी।रात दो बजे नेहा का निधन हो गया।मैं टूट गया। मुझे सम्हाला मौसी ने।मुन्नी नवजात की सेवा में दिन रात लगी रहती।कभी कभी बिन माँ की बच्ची सारी रात रोती मुन्नी पूरी रात जागती। नेहा के बिना घर सूना सूना लगता मौसी समझाती बेटा धीरज रखो।प्रभु की इक्छा के आगे किसी का वश नही चलता।समय अपनी गति से चल रहा था।रूही अब तीन साल की हो गयी।वह हर समय मुन्नी के पीछे लगी रहती बस रात में सोती थी मेरे पास वो भी जब मुन्नी की गोद मे सो जाती वो ला कर मेरे पास सुला जाती।वह मुन्नी को निन्नी कहती।जीवन चल रहा था।मौसी बीमार रहती।एक दिन मुन्नी ने आ कर कहा छोटे साहब आपको माँ बुला रही है।मै गया मौसी के पास बैठा वो हाँफते हुए कमज़ोर आवाज़ में बोली भैया हाथ जोड़ के विनती है मेरे बाद मुन्नी का ध्यान रखना।मैंने हाथ पकड़ कर कहा विनती नही आदेश कहिए आप मेरी माँ जैसी है।कुछ नही होगा आपको ठीक हो जाएगी।मुन्नी सुबक रही थी।मत रो मुन्नी मै मौसी का अच्छे से अच्छा इलाज करवा रहा हूँ।वो ठीक हो जाएंगी।
सुबह मुन्नी की चीत्कार से नींद टूटी।रात मौसी सोई तो फिर नही उठी। हम अपने अपने गमो में डूबे जी रहे थे।हमें जीवन दे रही थी रूही उसकी बाल चपलता में हम गम भूल जाते।
कल से रूही को बुखार था। खांसी भी आ रही थी। इधर करो ना भी बढ़ रहा था। हाहाकार मचा था। जिंदगी थम सी गई थी। मैं और मुन्नी परेशान थे। हंसते मुस्कुराते रहने वाली रूही परेशान थी। डॉक्टर को दिखाया दवा दे पर आराम नहीं मिला। मन आशंकित था की कहीं करो ना ना हुआ हो। जांच कराई तो करो ना कि पुष्टि हो गई। अस्पताल वाले रूही को लेने आये।वह चीख चीख कर रो रही थी।निन्नी निन्नी।मुन्नी भी उसेछोडना नही चाह रही थी।वह भी रो रही थी।मेरे बिना कैसे रहेगी वो।छोटे साहब मैं जॉऊगी।नही मुन्नी वो वहाँ किसी को नही रहने देंगे।रूही के जाने के बाद चूल्हा नही जला।घर भूत सा लग रहा था।सुबह मुन्नी चाय देने आई तो बोली मैंने पराठे सब्ज़ी बना दी है।आप खा लीजिएगा।मुझे कुछ काम से बाहर जाना है।कहाँ।वह चुपचाप निकल गयी।
मुन्नी अस्पताल पहुंची पता करते करते वह डॉक्टर से मिली साहब मेरी रूही मेरे बिना रह नहीं पाएगी। वह मर जाएगी मुझे उसके साथ रहने दीजिए। नहीं नहीं यह संभव नहीं है। अच्छा मुझे दूर से दिखा दीजिए। मुन्नी वार्ड के पास गई तो देखा रूही की रोने की आवाज सुनाई पड़ रही है। वह निन्नी निन्नी करके चीख रही है।। बस पता नहीं क्या हुआ मुन्नी ने डॉक्टर के पैर पकड़ लिए। आप तो भगवान हैं क्या आप एक बच्ची को मरता हुआ देख सकते हैं। बस इतना उपकार कर दीजिए मुझे उसके पास रहने दीजिए। आप कौन है उसकी मां। नहीं क्या जन्म देने से ही मां होती है मैंने उसे मां बनकर पाला है उन्होंने मुन्नी से मेरा नंबर लेकर फोन किया आप आकर इन्हें घर ले जाइए। मेरा माथा ठनका मुन्नी वहां कैसे पहुंच गई। अस्पताल पहुंचा तो देखा मुन्नी सिर झुकाए रो रही हैं। डॉक्टर ने कहा आप इन्हें घर ले जाइए। चलो मुन्नी। नहीं मैं जान दे दूंगी पर घर नहीं जाऊंगी। यही भूखी प्यासी रह कर रूही को देखते रहूंगी। आखिर मुन्नी की जिद के आगे डॉक्टर मान गए।ठीक है आपको ये पी पी ई किट पहन कर रहना होगा।हाँ जैसा आओ कहेंगे मैं वैसा ही करूगी।मुन्नी ने कहा छोटे साहब आप घर जाईये अपना ध्यान रखिएगा।मैं अपनी रूही को भगवान से ठीक करा कर ही आऊँगी।वार्ड में मुन्नी किट पहन कर गयी।रूही उससे लिपट गयी निन्नी निन्नी मुझे छोड़ कर मत जाना।नही मेरी बच्ची मैं कही नही जाऊँगी। देख कर वहाँ खड़े लोगो की आँखे नम हो गयी। 15 दिन बाद मुन्नी रूही को लेकर घर आ गयी। मेरे पास शब्द नहीं थे मुन्नी को धन्यवाद देने के लिए। अपनी जान पर खेलकर उसने मेरी बेटी की जान बचाई थी नहीं तो अकेले रो-रो कर मेरी बेटी मर ही जाती। सारे अस्पताल में उसके त्याग मां ममता की चर्चा थी। अखबार टीवी वालों ने मुन्नी का इंटरव्यू लिया वा छापा। पापा पापा निन्नी नही आई।मेरी तंद्रा टूटी। सारी रात सोचरे सोचते बीत गई।मैं उसके कमरे के पास गया।द्वार खटखटाया आवाज़ दी मुन्नी मुन्नी कोई जवाब न आने पर ठेला तो दरवाजा खुल गया।चारपाई पर मुन्नी अचेत सी पड़ी थी। बुखार से माथा तप रहा था।मैंने दवा दी माथे पर पट्टी रखी।रूही भी आ गयी थी।पापा निन्नी को क्या हुआ।शाम को बुखार उतरा ।मुन्नी ने आँखे खोली मुझे देख उठने लगी अरे छोटे साहब आप यहाँ और रूही भी।हाँ तुम्हे तेज़ बुखार था।उठो नही लेटी रहो।मुन्नी अब तुम घर चल कर रहो।मैं जानता था कि तुम बिजली की कड़क से डरती हो।कल उससे डर कर तुम्हे बुखार आ गया।अब मैं तुम्हें अकेला नही छोडूंगा।वह फीकी मुस्कान से बोली आपके साथ रहूंगी तो लोग क्या कहेंगे।कहने दो मुझे किसी की परवाह नही हमारे बीच मे इंसानियत का रिश्ता है।साहब ये हम और आप जानते है।दुनियां रिश्ते का नाम माँगती है।मैं नही चाहती मेरे कारण कोई आपको कुछ कहे।मैंने मन ही मन निर्णय लिया।मुन्नी क्या तुम मुझे कुछ दे सकती हो।साहब मैं क्या आपको देने लायक हूँ।बस तुम अपनी ममता के दान दे दो हमेशा के लिए मेरी बेटी को।मैं कुछ समझी नही साहब।मैंने उसका हाथ अपने हाथ मे लेते हुए कहा मेरी बेटी की माँ बन जाओ ।मैं पत्नी स्वीकार करता हूं।अब तो मिल गया न रिश्तों को नाम।क्या मैं सपना देख रही हूं।नही सच वह रोने लगी आँसू पोछते हुए नीलेश बोला उठो घर चलो।मुन्नी व रूही का हाथ थामे नीलेश घर आया।
मुन्नी चाय लाई नीलेश ने प्यार से पास बैठाते हुए कहा मुन्नी अब मैं साहब हूं छोटा साहब नही।रूही दौड़ कर दोनों के बीच बैठ गयी।उनकी हँसी से कमरे में खुशियॉ के फूल बिखर गए।