सपनो को।।।।

मैं उन्मुक्त आकाश छूना चाहती
मेरे अरमानो को उड़ने दो
देखा जो सतरंगी सपना मैंने
उसको पूरा होने दो
मैं अबला नही सबला हूँ
मुझे उन्नति शिखर पर चढ़ने दो
तुमने छला मुझे हर युग मे
पहनाई पराधीनता की बेड़ी
पिता ,पति,पुत्र के सदा मैं
आधीन रही
तुम सबकी में छाया बनी पर अपना अस्तित्व में खो बैठी
मैं समझ मे छुपे हुए भेड़ियों से डरती हूँ
कही बन न जॉऊ शिकार में ये सोच के सहमी रहती हूँ
कभी कोख कभी दहेज़ के लोभ में मारी जाती हूँ
बिना कसूर ही तलाक का दंश दे घर से निकाली जाती हूँ
बस चूक गया धैर्य अब मुझे भी मन का करने दो
अपने ख्वाबो में खुशी के रंग भरने दो
कंधे से कंधा मिला तुम्हारे साथ मे चलती हूँ
शिक्षा,साहित्य,विज्ञान किसी क्षेत्र न तुमसे मैं पीछे हूँ
मेरे सपनों को अमली जामा पहनने दो
न रोको मेरी राहे मेरे सपनों को पूरा होने दो