भारतीय समाज सुधार की परंपरा में संत गाडगे महाराज का नाम एक ऐसे लोकनायक के रूप में लिया जाता है जिन्होंने अंधविश्वास उन्मूलन, स्वच्छता और सामाजिक समानता को जनआंदोलन का रूप दिया। उनका जीवन केवल आध्यात्मिक संदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का व्यावहारिक उदाहरण बना।
निर्धन परिवार में जन्मे गाडगे महाराज ने समाज में व्याप्त असमानता, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों को बहुत करीब से देखा। उन्होंने यह महसूस किया कि सामाजिक पिछड़ेपन की जड़ केवल आर्थिक अभाव नहीं, बल्कि अज्ञान और अंधविश्वास भी हैं। इसी सोच ने उन्हें जनजागरण की राह पर आगे बढ़ाया।

उनकी कार्यशैली अनूठी थी—वे किसी भी गांव में पहुंचकर सबसे पहले स्वयं झाड़ू उठाकर सफाई करते थे। उनके लिए स्वच्छता केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मसम्मान का प्रतीक थी। उन्होंने लोगों को समझाया कि वास्तविक धर्म मानव सेवा है और दान का सर्वोच्च रूप जरूरतमंदों की सहायता है।
Aqa मूल आधार थी। उन्होंने जाति-व्यवस्था और छुआछूत का खुलकर विरोध किया तथा दलितों और वंचितों के साथ बैठकर भोजन कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने छात्रावास और सामाजिक संस्थानों के निर्माण में योगदान देकर यह सिद्ध किया कि जागरूकता ही परिवर्तन का सबसे बड़ा साधन है।
आज जब देश में स्वच्छता, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक समावेशन पर जोर दिया जा रहा है, तब गाडगे महाराज के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। उनका जीवन यह बताता है कि जनचेतना और व्यक्तिगत आचरण से ही स्थायी सामाजिक परिवर्तन संभव है।
इस संदर्भ में सामाजिक चिंतन प्रस्तुत करते हुए डॉ प्रमोद कुमार, डिप्टी नोडल अधिकारी, MyGov तथा डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय ने कहा कि गाडगे महाराज की विरासत आज भी समाज को विवेक, स्वच्छता और समानता की दिशा में प्रेरित करती है।