संवाददाता. मोहन सिंह बेतिया
राजा महाराजाओं की विरासत “बेतिया राज” की करूण व्यथा शायद ही कोई लेखक अपनी शब्दों की भावना के साथ लिख सकें क्योंकि “लिखते रहें पत्रकार और लूटती रही विरासत”।
ऐसा ही बेतिया राज के द्वारा उद्गमित बेतिया के लिए जीवन दायिनी बनने वाली नदी की विरासत दिन प्रतिदिन विलुप्त होने की कगार पर पहुंच पहुंच कर सिसक रही है।
नदी को बंद करने से लेकर नदी को भरकर उसे नाली में तब्दील को अह्वाम बेचैन दिखाई पड़ती है क्योंकि इस महंगाई के जमाने में जमीन खरीदना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है पर नदी को भरकर विरासत मिटाकर आशियाना बनाना सबसे सरल प्रतीत हो रहा है। हो भी क्यों ना क्योंकि अब तो ना राजा है ना महाराजा तो फिर क्यों बचाई जाए चंद्रावत नदी और क्या लाभ है इन नदियों से जिसमें ना नाव है और ना ही जल। ना ही इस्तेमाल है और ना ही इसकी धार्मिक ऐतिहासिक महत्व। आधुनिक जीवन शैली व आधुनिकता में ऐसे नदियों का ना ही कोई महत्व है और ना ही कोई उपयोगिता। महत्व है तो बस बेशकीमती जमीनों को अतिक्रमित कर घर बनाकर रहने का।
हालांकि जिले के विभिन्न प्रखंडों में पड़ने वाली चंद्रावत अतिक्रमण के कारण विलुप्तप्राय होने की स्थिति बनाए हुए है। पर बेतिया प्रखंड क्षेत्र में चंद्रावत नदी में तत्काल अतिक्रमण करने के लिए मिट्टी भराई और ईंट द्वारा पक्का निर्माण कराने की सामान गिराई जा रही है। यह निर्माण का सामान निर्माणाधीन गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के सटे मेडिकल वाहन गैराज के पश्चिम दिशा में स्थित नदी किनारे किया जा रहा है। चंद्रावत नदी की जीर्णोद्धार के लिए मुख्यतः पांच सालों से लगातार चर्चाएं व निर्देश जारी हैं। जिसको लेकर कई बार जिला व प्रदेश स्तर पर समीक्षा बैठक भी हुई और आदेश भी दिया गया। नदी की पैमाइस करने के लिए अंचलाधिकारी बैरिया, नौतन व बेतिया के साथ वर्तमान नगर निगम के आयुक्त तक को जिम्मेदारी दी जा चुकी है। पर संभवतः यह सारी निर्देश व समीक्षा कागजों से लेकर मीडिया तक सिमट कर ही दिखाई पड़ती रही है।
हालांकि चंद्रावत नदी के प्रेमियों ने कहा कि तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ निलेश रामचंद्र देवड़े के समय जहाँ अभी अतिक्रमण किया जा रहा है वहाँ से अतिक्रमण हटाया गया था और उनकी तत्परता और पहल से चंद्रावत नदी के अतिक्रमण मुक्त और अविरल होने की उम्मीद बहुत ही बढ़ गई थी परन्तु उनके स्थानांतरण के पश्चात यह चंद्रावत नदी का मामला ठंडा हो गया। हालांकि वर्तमान जिलाधिकारी कुंदन कुमार के समय भी कई बार निर्देश व समीक्षा रिपोर्ट तैयार की गई परन्तु उन्होंने चंद्रावत नदी के जीर्णोद्धार को कभी भी धरातल पर उतारने का काम नहीं किया। उनकी उदासीनता ही है कि वो समीक्षा करते हैं और अतिक्रमणकारी अतिक्रमण करते जाते हैं। वर्तमान जिलाधिकारी यदि सकारात्मक पहल के साथ प्राथमिकता दें तो चंद्रावत नदी को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है।