Bihar news Save agriculture, save democracy - repeal anti-farmer laws and guarantee MSP - Kisan Mahasabha
जिले के किसानों के बाढ़ से बर्बाद धान के बिचड़ा को कृषि फार्म में उगा कर किसानों में वितरित करो- सुनील कुमार राव
संवाददाता. मोहन सिंह बेतिया देश के अन्नदाता किसान 74 साल से अन्न पैदा कर अपनी जिम्मेवारी निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है। जब देश आजाद हुआ तब 33 करोड़ देशवासियों का पेट भरते थे। आज उतनी ही जमीन के सहारे 140 करोड़ जनता को भोजन देते हैं।कोरोना महामारी के दौरान जब देश की बाकी अर्थव्यवस्था ठप्प हो गई, तब भी अपनी जान की परवाह किए बिना रिकॉर्ड उत्पादन किया, खाद्यान्न के भंडार खाली नहीं होने दिए।लेकिन इसके बदले मोदी सरकार ने तीन ऐसे काले कानून लागू कर दिया है जो हमारी नस्लों और फसलों को बर्बाद कर देंगे, जो खेती को हमारे हाथ से छीनकर कंपनियों की मुठ्ठी में सौंप देंगे। ऊपर से पराली जलाने पर दंड और बिजली कानून के मसौदे की तलवार भी हमारे सर पर लटका दी। खेती के तीनों कानून असंवैधानिक हैं क्योंकि केंद्र सरकार को कृषि मंडी के बारे में कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है। यह कानून अलोकतांत्रिक भी हैं। इन्हें बनाने से पहले किसानों से कोई राय मशवरा नहीं किया गया। इन कानूनों को बिना किसी जरूरत के अध्यादेश के माध्यम से चोर दरवाजे से लागू किया गया।
उक्त बातें अखिल भारतीय किसान महासभा के जिलाध्यक्ष सुनील कुमार राव ने नाथ बाबा चौक पर किसानों के दिल्ली बार्डर पर सात माह पुरा होने पर अखिल भारतीय विरोध दिवस पर कहा। उन्होंने कहा कि हम सरकार से दान नहीं मांगते, बस अपनी मेहनत का सही दाम मांगते हैं। फसल के दाम में किसान की लूट के कारण खेती घाटे का सौदा बन गई, किसान कर्ज में डूब गए और पिछले 30 साल में 4 लाख से अधिक किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसलिए हमने बस इतनी सी मांग रखी कि किसान को स्वामीनाथन कमीशन के फार्मूले (सी2+50%) के हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी पूरी फसल की खरीद की गारंटी मिल जाए। इस पर अपना वादा पूरा करने की बजाय सरकार ने दुगुने आय जैसे जुमले गढ़ आपके पद की गरिमा को कम किया।पिछले सात महीने से भारत सरकार ने किसान आंदोलन को तोड़ने के लिए के लोकतंत्र की हर मर्यादा की धज्जियां उड़ाई हैं। देश की राजधानी में अपनी आवाज सुनाने के लिए आ रहे अन्नदाता का स्वागत करने के लिए इस सरकार ने हमारे रास्ते में पत्थर लगाए, सड़कें खोदीं, कीलें बिछाई, आंसू गैस छोड़ी, वाटर कैनन चलाए, झूठे मुकदमे बनाए और हमारे साथियों को जेल में बंद रखा। किसान के मन की बात सुनने की बजाय उन्हें कुर्सी के मन की बात सुनाई, बातचीत की रस्म अदायगी की, फर्जी किसान संगठनों के जरिए आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की, आंदोलनकारी किसानों को कभी दलाल, कभी आतंकवादी, कभी खालिस्तानी, कभी परजीवी और कभी कोरोना स्प्रेडर कहा। मीडिया को डरा, धमका और लालच देकर किसान आंदोलन को बदनाम करने का अभियान चलाया गया, किसानों की आवाज उठाने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के खिलाफ बदले की कार्यवाही करवाई गई। माले नेता सुरेन्द्र चौधरी ने कहा कि हमारे 500 से ज्यादा साथी इस आंदोलन में शहीद हो गए। पिछले सात महीने में हमने जो कुछ देखा है वो हमे आज से 46 साल पहले लादी गई इमरजेंसी की याद दिलाता है। आज सिर्फ किसान आंदोलन ही नहीं, मजदूर आंदोलन, विद्यार्थी-युवा और महिला आंदोलन, अल्पसंख्यक समाज और दलित, आदिवासी समाज के आंदोलन का भी दमन हो रहा है। इमरजेंसी की तरह आज भी अनेक सच्चे देशभक्त बिना किसी अपराध के जेलों में बंद हैं, विरोधियों का मुंह बंद रखने के लिए यूएपीए जैसे खतरनाक कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है, मीडिया पर डर का पहरा है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है, मानवाधिकारों का मखौल बन चुका है। बिना इमरजेंसी घोषित किए ही हर रोज लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है।हारूण गद्दी ने कहा जिले के किसानों का हजारों हेक्टेयर में लगाने के लिए लगाए गए बिचड़े बाढ़ की पानी से बर्बाद हो गया है। उनके फ़सल लगाने के लिए सरकारी कृषि फार्म में बिचड़ा उगाकर किसानों में वितरित करे। मौके पर बिनोद कुशवाहा,जोखू चौधरी,मोजम्मिल हूसैन, ठाकुर साह,लाल बाबू पटेल, नागेंद्र शर्मा,हदीश मियां, संजय कुशवाहा ,तपसी शर्मा,सुकट चौधरी, जितेंद्र प्रसाद, अखिलेश प्रसाद आदि मौजूद थे।