संवाददाता. मोहन सिंह बेतिया
विभागों में पदस्थापित अधिकारियों व कर्मचारियों की एक समय सीमा अवधि के लिए पदस्थापना होती है और एक निश्चित समय सीमा पूरी हो जाने पर उनकी स्थानांतरण प्रदेश और जिला स्तरीय कि जाती है। किसी भी जिला या विभागों में नियमित रूप से स्थायी पदस्थापन किसी की नहीं की जाती है। इस स्थानांतरण के पीछे सबसे बड़ा कारण यह होता है कि कहीं भी व्यक्ति विशेष का कोई खास वर्चस्व व प्रभाव ना बना रहे जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिले। परन्तु पश्चिम चम्पारण जिले की वस्तु स्थिति ही कुछ अलग तरीके की है। यूं तो यहाँ के सभी विभागों की सूक्ष्मता से समीक्षा की जाए तो ऐसे कई विभागों में जमे कर्मचारियों की सूची प्राप्त हो जाएगी कि वो पिछले कई सालों से अपने उसी कुर्सी से जमे हुए हैं। अधिकारियों की मिली भगत या फिर उन तक वैसे लोगों की सूची ना भेजकर हमेशा स्थानांतरण का कोरम पूरा कर लिया जाता है।
जहाँ बिहार राज्य में सुशासन की सरकार अपनी सुशासन की गुण गाते नहीं थकती और जहाँ शराबबंदी की उपलब्धियों को गिनाते नहीं थकती, जिसकी हकीकत आए दिन प्रदेश में बरामद भारी मात्रा में शराब और शराब से होने वाली मौतें हैं। वैसे में जब भी कोई गड़बड़ी व घटना होती है तो नीचले स्तर से शायद ही समीक्षा होती होगी। हालांकि इन सब घटनाओं और भ्रष्टाचारों के पीछे कहीं ना कहीं हर वो कुर्सी व पद जिम्मेदार होती हैं जो वर्षों से अपनी कुर्सी पर जमे होते हैं। थानों के लिए जितने जिम्मेदार थानाध्यक्ष होते हैं उससे कतई कम वहां वर्षों से जमे कुर्सी पकड़े मुंशी भी नहीं होते हैं। फिर भी किसी भी घटना पर सिर्फ थानाध्यक्ष पर कार्यवाही करते हुए स्थानांतरित व निलंबित कर देना और वहाँ वर्षों से जमे पदस्थापित मुंशी को जमे रहने देना पुनः उस तरह के भ्रष्टाचार और घटना के पुनरावृत्ति की मुख्य जड़े बनकर पनपने के लिए छोड़ देना होता है।
हर साल, दो साल व तीन साल पर पुलिस अधीक्षक की स्थानांतरण व पदस्थापना होती है परन्तु उनके संज्ञान में नहीं आता है कि कौन से थानों में कौन से अधिकारी व कर्मचारी कितने वर्षों से हैं? यह कुर्सी का आलम इस कदर है कि मुंशी के रूप में ना सिर्फ सिपाही स्तर के हैं ब्लकि दफदार व चौकीदार स्तर के भी व्यक्ति दशकों से थानों में सिर्फ मुंशी का काम करते हैं। कहीं कहीं तो निजी व्यक्तियों को भी थानों के मुंशी के रूप में पदस्थापित रखा गया है। वहीं सूत्रों की मानें तो कुछ जगहों पर मुंशी की पदस्थापना होने के बावज़ूद भी यहीं लोग मुंशी का काम करते हैं। यह मुंशियों की कमी के कारण है अथवा किसी अन्य कारणों से यह तो विभागीय जांच का विषय है। चाहे जिस कारण से हो परन्तु थानों की कमान थानाध्यक्ष व मुंशी के ही कुशल देख रेख में होती है और इन्हीं के द्वारा थाना को संचालित किया जाता है। ऐसे में जो भी विभागीय व अन्य निजी कार्यों की देखरेख इन्हीं के द्वारा सम्पादित होती हैं।
सूत्र बताते हैं कि जिले के लगभग आधा दर्जन से अधिक ऐसे थाने हैं जहाँ ऐसा मामला है।और इन मामलों से विधि व्यवस्था से लेकर सभी अन्य कार्य भी प्रभावित होती हैं और परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार का बोल बाला बना रहता है। जहां अधिकारियों के पदस्थापना की समय सीमा होना पर ऐसे लोगों के लिए कोई सीमा ना होना असामाजिक व दलालों के लिए पनाहगार भी बना रहता है। यहीं लोग आने जाने वालों की परिचय पुराने व नए थानाध्यक्षों से करवा कर थानांतर्गत जो खेल किया करते हैं।
हालांकि हाल में ही बिहार के पुलिस महानिदेशक एस के सिंघल के द्वारा सभी पुलिस अधीक्षक व पुलिस उप महानिरीक्षक को यह निर्देशित किया गया है कि बिहार पंचायत चुनाव के पश्चात वर्षों से जमे पुलिस अधिकारियों की जिलेवार समीक्षा कर स्थानांतरित किया जाए। आपको बताते चलें कि किसी भी पुलिस को किसी एक जिले में सिर्फ 6 साल तक ही रहना है। उसके पश्चात उनकी स्थानांतरण जोन के अन्य जिलों में कर दी जाती है। परन्तु वर्तमान परिस्थिति में देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोग हो सकता है कि यहीं से सेवानिवृत्त भी हो जाए।