संवाद जनवाद टाइम्स न्यूज
जैतपुर: भाद्रपद-मास की शुक्लपक्ष की दशमी के दिन जैन धर्मानुयायियों द्वारा ‘सुगंध-दशमी’ या ‘धूप-दशमी’ पर्व मनाया गया। इस दिन जैन अनुयायियों द्वारा अग्नि में धूप डाली जाती है और अनुयायियों द्वारा ऐसा माना जाता हैं कि धूप-दहन के साथ प्राणी के कर्मों का भी दहन हो जाता है।पुराणों में धूपदशमी-व्रत और व्रत की कथा का उल्लेख मिलता है।

कथा में लिखा है कि एक कन्या जिसके शरीर में से पूर्वकृत पाप के उदय से भयंकर बदबू आती थी, जब वह मुनिराज के निकट पहुँची तो उसने पूछा “महाराज ! मेरे शरीर से इतनी बदबू क्यों आती है ?”
तब मुनिराज ने कहा कि “तुमने पूर्व जन्म में देव,गुरू धर्म की विराधना की थी उसके फल में तुम्हें ऐसा शरीर मिला है।”

तब उसने मुनिराज से इस दुर्गंध को दूर करने का उपाय पूछा तो मुनिराज ने कहा कि “तुम शांत परिणामों से भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की दशमी का व्रत करो।उसने ऐसा ही किया “ऐसा करने पर धीरे-धीरे पुण्य-योग से उसके शरीर से दुर्गंध जाती रही, और शरीर पूरी तरह से सुगंधित हो गया। तभी से ये व्रत की परम्परा शुरू हो गई। लेकिन इसे एक सामान्य व्रत के रूप में मनाया जाता है।

लेकिन वर्तमान में जो यह ‘धूपदशमी’ का रूप प्रचलित है वह जैन आम्नाय में कहीं से भी मान्य नहीं है।
संपूर्ण विश्व में विख्यात है कि जैन धर्म के अनुयायी अहिंसा में विश्वास रखते हैं सारी दुनिया अहिंसा धर्म के आगे नत मस्तक है। वहीं उसी के अनुयायी आज धर्म के नाम पर हिंसा का तांडव करते हुये दिखाई देते हैं , यह कैसी विडम्बना है।
संयम धर्म का पालन करने वाले इन्द्रिय-संयम और प्राणी-संयम की बात करते हैं , उसी दिन हम अनंत जीवों की हिंसा करते हैं ?
जिनवाणी में कहीं भी ऐसा उपदेश नहीं है कि हिंसा में धर्म होता है।

ऐसा कुकृत्य करने से पहले एक बार तो विचार करो कि अनंत-जीवों की हिंसा करके धर्म कैसे होगा ?? यदि कर्मों को जलाने का यही उपाय था तो तीर्थंकरों, भगवंतों और दिगम्बर साधुओं ने कर्मों की निर्जरा करने के लिये इतनी तपस्या ही क्यों की ? वे भी अग्नि में धूप डालकर अपने कर्मों को जला लेते।

यदि सच में संसार से थकान लगती है , संसार के दु:खों से भयभीत होकर दुखों से छूटना चाहते हो तो आज एक संकल्प करो कि अब तक भले ही अज्ञानता की हो पर आज से हम ऐसा कुकृत्य नहीं करेगें और अहिंसामयी धर्म को अपने जीवन में अंगीकार करेंगें