डॉ धर्मेंद्र कुमार
सड़क किनारे ढेर लगा कर बिकने वाली चप्पल -जूते दूसरी तरफ शॉपिंग मॉल में ब्रांडेड कंपनी के l दोनों में मूल अंतर यह है के सड़क किनारे बेचने वाले गरीब मजदूर दिहाड़ी होते हैं और उनसे खरीदारी करने वाले भी अति गरीब किसी तरह अपनी लाज बचाने के लिए खरीदते हैं l यूं तो आम दिनों में नंगे पैर कट जाते हैं किंतु रिश्तेदारी में जाने पर उनका उपयोग करना स्व -सम्मान की खातिर आवश्यक हो जाता है l पुलिस भी सड़क किनारे ढेर लगाने बालों को ,रेहड़ी लगाने वालों को आए दिन अपने जुल्म ज्यादती का शिकार बनाती है सड़क किनारे से खरीदी गई चप्पल जूता की उपयोगिता तब और देखी जा सकती है जब वह टूट जाने पर सुतली या धागा लगाकर फटे तलवों को गांठ कर पहन कर खुद को पहनने वाला संतोष महसूस करता है और सरकारें उनके नाम पर जीवन संवारने का दावा करती हैं l
बिना मकान ,कपड़ा ,जूता, चप्पल ,पंखा, बिजली गैस सिलेंडर के बिना अपना जीवन पूरी ईमानदारी के साथ बसर करता है वही भोजन के नाम पर पानी वाली दाल लकड़ी ऊपर जली हुई रोटियां ही उसके पेट भरने का एकमात्र उपाय है उसमें सरकारी सहायता किंचित मात्र नहीं होती l पति-पत्नी बच्चों की मेहनत दिन भर भर की मजदूरी से जुटाया गया भोजन होता है l

अबोध बच्चों, बूढ़ी मां पिता ,विकलांग ,गर्भवती स्त्रियों, युवाओं को जो जिंदगी बसर करने शहरों की ओर गए थे जिसमें दूरियों की कोई फिक्र नहीं की भोजन की तलाश ने उन्हें 100 ,200 ,500, 1000 ,1500… किलोमीटर तक जाने को विवश किया l सड़क किनारे झुग्गी झोपड़ी उन्होंने राज महल राजा प्रसाद मान लिया किंतु कोरोना के काल में अब निवाले की आशा भी खत्म होने पर अपना इरादा बदल कर गांव की ओर रुख किया और पैदल ही रवानगी कर ली l

सरकारें मदद का ढोल पीटती रही और उनको पानी भी दुश्वार रहा l सच्चाई तो यह भी है कि लोग जब सड़कों पर अबोध बच्चों को कंधों पर बिठाकर, पैदल चला कर, बूढ़े मां बाप को पीठ पर बिठाकर , गर्भवती को बच्चों वाली गाड़ी पर बिठाकर चले तब कुछ माताओं ने सड़क पर प्रसव पीड़ा सहन की l

नंगे पांव, भूखे पेट, वैकल्पिक गाड़ी, सूटकेस की गाड़ी बनाकर, वही फटी टूटी चप्पल, जूते बिना तलवे के, तपती धूप में हार मानने को तैयार नहीं l ऊपर से पुलिस की लाठियां ऐसा लगता है जैसे भगवान पिट रहे हैं! इन गरीबों के मुख से निकली हाय 22 मार्च 2020 से अब तक फिजाओं में गूंज रही है और जाने कब तक गूंजेगी काफिला थमने का नाम नहीं ले रहा l
सोचने की बात यह भी है यह प्रवासी मजदूर जो घरों की ओर लौट रहे हैं क्या सबने अपना सामान वहीं छोड़ दिया? या इन लोगों के पास सामान था ही नहीं ?फिर क्या अब तक यूं ही जीवन व्यतीत कर रहे थे ? रोज कमाना खाना इनके ऊपर आजादी का क्या प्रभाव पड़ा ? आज सही मूल्यांकन हो पाया है कि सरकार और उनकी अफसर साही कल्याणकारी योजनाओं का बंदरबांट करती रही और गरीबी को छुपाने के लिए मंचों से सभाओं में लच्छेदार भाषण दिए जाते रहे l
वर्तमान सरकार के भाजपाई मुख्यमंत्रियों के मुख से एक बात अक्सर सुना करते हैं कि देश मोदी जी के नेतृत्व में विकास कर रहा है यह जगजाहिर है कि बेवजह तारीफ करने वाले चाटुकार अधिक होते हैं सेवक कम l धन पतियों को बैंक तथा कैश दोनों प्रदान करने वाले लोग श्रमिक पैकेज पर जन और जगत का राग अलाप रहे हैं वहीं वित्त मंत्री ने हजारों मीट्रिक टन दाल बनाने का दावा किया जबकि भोजन की अनुपलब्धता और यह घोषणा मजदूरों के घावों पर नमक डालने का काम कर रही है l
देश में आज तक श्रमिक किसानों की धैर्य परीक्षा होती रही आज उनके फटे टूटे जूते चप्पलों की भी अग्नि परीक्षा हुई है जब तपती धूप में सड़कों पर रेलवे लाइन पर उन्होंने उन्हीं के सहारे सफर तय किया है l देश के प्रधानमंत्री को प्रधान होने के नाते अब इन घोषणाओं पर विराम लगा देना चाहिए क्योंकि आप की घोषणा /योजना राह चलते मजदूर सुन व देख नहीं पा रहे हैं क्योंकि वह सड़क व रेल पटरियों की दूरी नापने मैं व्यस्त हैं l
सरकार को का धरातल और कागज दोनों का मिलान करना चाहिए कि हकीकत क्या है ? मजदूर मजदूरी में व्यस्त रहा ,वोट दिया ,सरकार बनवाई ,फिर कमाने खाने लगा l सरकार वादा करती रही, कागज पूर्ति करती रही, हिंदू-मुस्लिम करती रही ,जातियों में विभेद करती रही, आरक्षण पर बेतुका बयान देती रही किंतु अब स्थिति स्पष्ट है कि भूख ,निवास ,रोजगार जैसे मूल मुद्दे सरकार के एजेंडे में शामिल नहीं हैं और फिर भी बाहबाई लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती l
तब इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं-
तुम्हारी फाइलों में हर तरफ मौसम गुलाबी है ,
मगर यह आंकड़े झूठे यह दावा किताबी है l
उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो,
इधर पर्दे के पीछे बर्बरता है नवाबी है l
लगी है होड़ सी देखो अमीरों और गरीबों में ,
यह गांधीवादी ढांचे की बुनियादी खराबी है l
डॉ धर्मेंद्र कुमार
6398425895