दिलीप कुमार इटावा: नमो कालिंदी के अंतर्गत विश्व नदी दिवस पर जागरूकता अभियान सोसायटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (स्कॉन) द्वारा यमुना नदी के किनारे हनुमान घाट पर जल संरक्षण एवं नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए जिला प्रशासन के सहयोग से चलाया गया।

जल का स्थान सजीवों के जीवन में वायु के समान है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में पानी, मनुष्य की काया के आधार पंच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी, पानी) में सम्मिलित है। दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं, जैसे कि- मिस्र की सभ्यता जोकि संसार की सबसे पुरानी मानव सभ्यता मानी जाती है। वह संसार की सबसे बड़ी नदी ‘नील नदी’ के किनारे विकसित हुई थी। अन्य सभ्यताएँ हड़प्पा सभ्यता, सिंधु नदी के तट पर व चीनी सभ्यता हृांगहो नदी के तट पर विकसित हुई थी।
जल सभी जीव-जन्तुओं की जीवन रेखा है। इस कथन का ऐतिहासिक सत्यापन प्राचीन मानव सभ्यताएँ करती हैं। परन्तु यह निराशाजनक सत्य है कि पृथ्वी का तीन- चौथाई भाग जल मनुष्य की पेयजल व घरेलू उपयोग सम्बन्धी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा है। जिन ऐतिहासिक व महत्त्वपूर्ण नदियों के किनारे प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई थी सभी प्रदूषण की मार झेल रही हैं। नदियों का 70 प्रतिशत जल प्रदूषित हो चुका है। सागरों का खारा पानी पीने योग्य नहीं हैं। नदियों की भाँति प्राकृतिक झीलों में भी शहरों व औद्योगिक क्षेत्रों का कचरा बहाया जा रहा है। भूगर्भ जल जो कि सर्वाधिक सुरक्षित माना जाता है रसायनों व उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण प्रदूषित हो रहा है। दिल्ली व कानपुर जैसे ज्यादा आबादी और बड़े औद्योगिक शहरों में भूगर्भ जल से दुर्गंध आती है जोकि पेयजल के त्रिगुण (स्वादहीन, रंगहीन, गंधहीन) का पालन नहीं कर रहा है।
स्कॉन सचिव वन्यजीव विशेषज्ञ संजीव चौहान ने बताया दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी आज भी ताजे पानी के लिए गंगा, ब्रह्मपुत्र, यलो, मीकांग, नील, टाइबर, राइन, डेन्यूब और अमेजन जैसी प्रमुख नदियों पर निर्भर है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन नदियों पर लगातार पड़ रहे दबाव व नदीतंत्र के अत्यधिक दोहन के परिणामस्वरूप इन नदियों पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। नदियों के साथ हो रही छेड़छाड़, खेती और मानव उपयोग के लिए खींचे जा रहे पानी और बढते प्रदूषण के कारण ये नदियां अब धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी हैं। इन्हें बचाने के लिए हम सबको मिलकर संरक्षण की दिशा में काम करना होगा।
धुव्रराज सिंह ने कहा कि जल ही जीवन है लेकिन विकास की अंधी दौड़ में मुफ्त में मिले इस बहुमूल्य संसाधन का इतना नुकसान किया जा रहा है कि आज भारत में बहने वाली अधिकतर नदियों के प्रवाह क्षेत्र और उनकी जल गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। भारत में प्राकृतिक जल संसाधन के अंधाधुंध दोहन और मानव निर्मित फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकले प्रदूषण की शिकार होकर अधिकतर नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। लेकिन अभी हाल में किए जा रहे नमामि गंगे के प्रयासों से हमारी यमुना कुछ साफ हो चली है
अनुज तिवारी ने उपस्थित जनों को शपथ दिलाते हुए कहा कि हम नदियों में कोई प्रदूषक नहीं डालेंगे। हम नदियों की शुद्धता के बनाए रखने की दिशा में काम करेंगे। जहां तक संभव होगा पॉलीथिन का प्रयोग नहीं करेंगे। नदियों में जानवरों को नहलाने और कपड़े धोने में साबुन का प्रयोग नहीं करेंगे।