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साधना के प्राचीन केंद्रों में शुमार है इटावा का धूमेश्वर(नीलकंठ महादेव) मंदिर, भक्तों की पूरी होती हैं सभी मनोकामनाएं

संवाददाता मनोज कुमार राजौरिया : साधना के प्राचीन केंद्रों में शुमार है इटावा का धूमेश्वर(नीलकंठ महादेव) मंदिर, भक्तों की पूरी होती हैं सभी मनोकामनाएं । जनश्रुति के मुताबिक, भगवान शंकर, भगवान कृष्ण व पांडव भी महर्षि धौम्य के आश्रम में आए थे और इन सभी ने कुछ दिनों तक यहां पर विश्राम भी किया था}

इटावा यमुना नदी के तट पर बसे उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में स्थित पांडवकालीन धूमेश्वर महादेव मंदिर सदियों से शिव साधना के प्राचीन केंद्र के रूप में विख्यात रहा है। धूमेश्वर महादेव मंदिर यमुना नदी के किनारे छिपैटी घाट पर बना हुआ है।

महाभारतकालीन इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना पांडवों के गुरु महर्षि धौम्य ने की थी। धौम्य ऋषि की साधना स्थली पर यह मंदिर बना हुआ है। मंदिर की विशेषता यह है कि जहां अन्य शिव मंदिरों में भगवान का पूरा परिवार रहता है, वहीं यहां पर सिर्फ शिवलिंग ही स्थापित है। जनश्रुति के मुताबिक, भगवान शंकर, भगवान कृष्ण व पांडव भी महर्षि धौम्य के आश्रम में आए थे और इन सभी ने कुछ दिनों तक यहां पर विश्राम भी किया था।

श्रीमद्भागवत के अलावा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी महर्षि धौम्य की विस्तार से चर्चा की गई है। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर महर्षि धौम्य का आश्रम पावन यमुना नदी के किनारे बताया गया है। किसी समय इटावा इष्टिकापुरी के नाम से प्रसिद्ध था। इटावा पांचाल क्षेत्र के तहत आता है, इसलिए महर्षि धौम्य ने यहां अपनी साधना का केंद्र बनाया था। यहीं पर वे साधना में लीन रहते थे और अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने अपने शिष्यों के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी।
प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं के.के. कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. विद्याकांत तिवारी बताते हैं कि महर्षि धौम्य का आश्रम महाभारतकालीन पांचाल क्षेत्र का सबसे बड़ा अध्ययन केंद्र था। यहां श्रुति, स्मृति एवं पारायण शैली की शिक्षा दी जाती थी, लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को ताड़पत्रों, भोजपत्रों पर विभिन्न विषयों के ग्रंथों को लिपिबद्ध कराया था। इस आश्रम में कई यज्ञशालाएं भी थीं जिनमें प्रतिदिन यज्ञ होते थे। मान्यता है कि आज भी इस तपोभूमि में यज्ञ करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
शिष्यों के लिए प्रकट किया था शिवलिंग
आश्रम में दूर-दूर से विद्यार्थी और राजघराने के राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां पर महर्षि के प्रिय शिष्य आरुणि तथा उपमन्यु ने अपने ज्ञान का विस्तार किया था। ये दोनों शिष्य भगवान शंकर के प्रिय भक्त थे। महर्षि धौम्य ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए साधना द्वारा शिवलिंग प्रकट किया था और यही शिवलिंग आज धूमेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
विकास की राह तक रहा मंदिर
डॉ. विद्याकांत तिवारी कहते हैं कि जिले में भगवान शिव के प्राचीन मंदिरों की संख्या कम नहीं है, लेकिन यहां कुछ शिव मंदिर ऐसे हैं, जिनका अपना एक अलग महत्व एवं प्राचीन इतिहास है। इन्हीं शिव मंदिरों में एक धूमेश्वर महादेव मंदिर है, देशभर में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की प्रसिद्धि के हिसाब से इसका कोई खास विकास नहीं हो सका है। क्षेत्र के लोगों ने इस प्राचीन धरोहर का विकास कराये जाने की मांग की है। यहां पर सावन, शिवरात्रि तथा प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालुओं की खासी भीड़ होती है।
भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं धूमेश्वर महादेव
धूमेश्वर महादेव मंदिर के महंत विजय गिरि का कहना है कि मंदिर परिसर में ही महर्षि धौम्य की पावन समाधि बनी हुई है। सात पीढ़ियों से उनके परिवार के लोग मंदिर की देखरेख कर रहे हैं, क्योंकि परिवार के लोग दशनामी जूना अखाड़ा से जुड़े हुए हैं। मंदिर परिसर में महर्षि धौम्य के अलावा औम्दा गिरि, चमन गिरि, उम्मेद गिरि व शंकर गिरि की समाधियां भी बनी हुई हैं। उन्होंने बताया कि पहले सिर्फ शिवलिंग व महर्षि धौम्य की समाधि थी, जब सुमेर सिंह किले का निर्माण हुआ उसी समय राजा सुमेर सिंह ने मंदिर व यमुना के किनारे अन्य घाटों का भी निर्माण कराया है। विजय गिरि बताते हैं कि यह बहुत पावन स्थान है। यहां पर आने वाले भक्तों की मनोकामना धूमेश्वर महादेव पूरी करते हैं।