देश सम्पादकीय

शिक्षक दिवस पर विशेषांक : निखिल 

शिक्षक दिवस पर विशेषांक : निखिल 

ठेस लगने पर रास्ते में पड़ा पत्थर भी हमें ज्ञान देता है कि कठोरता मेरी प्रकृति है पर किसी को चोट पहुंचाना नहीं, आपको देखकर चलना चाहिए कदमों को संभाल के चलना चाहिए, क्योकि जीवन में भविष्य निर्माण के पथ पर पदार्पण कर चुके है तो आवश्यक है आप सुरक्षित और समय से पहुँचे जरूरी नही की चोट खाकर ही पहुचें।चोट लगने पर हर कोई अपनी पीड़ा पर ध्यान देता है उसका इलाज करता है , और आगे बढ़ जाता है पर पत्थर की पीड़ा को कोई नहीं समझता गिरकर संभलना चलना तो हर कोई सीख गया। पर पत्थर की पीड़ा ये है कि कोई विरला तो आएगा जो अपने जैसा घाव दूसरे को न लगने दे मुझे यहां से हटाकर किनारे कर दे ..यदि अकेले नहीं सक्षम तो किसी से सहायता ले ले। कई भाव कई सीख देकर जाती हैं छोटी छोटी चीजें छोटी छोटी बातें पर इंसान अपने जीवन मे इतना अस्त व्यस्त है कि वो भूल चुका है कि वो मनुष्य है और मनुष्यता उसका मूल।गुरु सदैव अपने शिष्य का हित चाहता है सदैव उसे कामयाब देखना चाहता है।आपकी सफलता का जश्न आपके माता पिता रिश्तेदार मित्र सभी मनाएंगे सबका कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से योगदान व स्वार्थ भी जुड़ा होता है ,पर गुरु अकेला ऐसा होता है जो आपकी सफलता को देखकर गर्व महसूस करता है निःस्वार्थ मुस्कुराता है।पर आजकल शिक्षक होने के मायने और सफलता के मानक ही बदल गए हैं।जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए सब इतना लालायित हैं कि सफल होने की रूपरेखा ही बदल रखी है।यदि पैसा कमाना ही जीवन में सफलता को परिभाषित करता है तो हाँथ पैर से सक्षम व्यक्ति भी स्टेशन पर भीख मांगकर 400 500 प्रतिदिन कमाता है।मेरे हिसाब से ये सफलता नहीं सफल व्यक्ति वो है जो सफलता के पथ पर दौड़ते हुये हर एक उस नियम का पालन करे जो आवश्यक है।संस्कार को बचाये रखना, इंसानियत को बचाये रखना मनुष्य होकर मनुष्यता का परिचय देना।पवित्र कर्मों के माध्यम से जीवन को उस मोड़ पर पहुँचाना जहाँ लोग आपको आपके पैसे से नहीं आपके अच्छे कर्मों की वजह से जाने ।

अब करते ज्ञान बांटने वालों की बात ..मास्टर बनना आसान है पर शिक्षक बनना नहीं,आजकल सभी पैसे लेते हैं ज्ञान देते हैं पर जो निष्कपट भावना से अपने छात्र छात्राओं को अपने पुत्र पुत्री समान जानकर उसके उज्जवल भविष्य के लिए अनवरत प्रयास करे वही है असल का शिक्षक ।आजकल तो शिक्षक की परिभाषा को एक नया रूप दे दिया गया है, मर्यादाहीन हो गए है बहुत से ज्ञान बांटने वाले लोग , यदि शिक्षक ही अपनी मर्यादा भूल जाएं तो संसार का विनाश, संस्कार का विनाश निश्चित है।संस्कार का नाश समूल नाश का आधार है। जो कहीं न कहीं पीड़ा है और कहीं न कहीं एक सकारात्मक सोच जो अंधियारे मार्ग में भटकने वालों के लिये प्रकाश पुंज का कार्य करेगी पर समझदार के लिए इशारा भी काफी होता है । शिक्षक दिवस की असीम मंगलकामनाएं।          🙏🙏🙏🙏🙏🙏